किसान कैसे बचाएं पाले से अपनी फसलों को – अधिष्ठाता प्रोफेसर डी. के. सिंह

किसान कैसे बचाएं पाले से अपनी फसलों को – अधिष्ठाता प्रोफेसर डी. के. सिंह

रिपोर्ट- डा.बीरेन्द्र सरोज आजमगढ

आजमगढ़ / सर्दी का मौसम शुरू होते ही ठंडक बड़ी समस्या बनकर खड़ी हो जाती है। तेज ठंड के कारण फसलों पर पाला पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। पाला किसी प्रकार का रोग ना होते हुए भी विभिन्न फसलों, सब्ज़ियों, फूलों एवं फल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। पाले के कारण सब्ज़ियों में 80-90 प्रतिशत, दलहनी फसलों में 60-70 प्रतिशत तथा अनाज फसलों जैसे गेहूं व जौ में 10-20 प्रतिशत का नुक़सान हो जाता है। इसके अतिरिक्त फलदार पौधे जैसे- पपीता व केला आदि में भी 80-90 प्रतिशत तक का नुकसान पाले के कारण हो सकता है। पाला क्या होता है इससे अपनी फसलों को कैसे बचाएँ इस बारे में कृषि महाविद्यालय आजमगढ़ के अधिष्ठाता प्रोफेसर डी के सिंह और महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डा प्रकाश यादव ने विस्तार से बताया
प्रायः पाला पड़ने की आशंका 1 जनवरी से 15 जनवरी तक अधिक रहती है। जब आसमान साफ हो, हवा न चल रही हो और तापमान कम हो जाये तब पाला पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। दिन के समय सूर्य की गर्मी से पृथ्वी गर्म हो जाती है तथा पृथ्वी से यह गर्मी विकिरण द्वारा वातावरण में स्थानातंरित हो जाती है। इसलिए रात्रि में जमीन का तापमान गिर जाता है, क्योंकि पृथ्वी को गर्मी तो नहीं मिलती और इसमें मौजूद गर्मी विकिरण द्वारा नष्ट हो जाती है। तापमान कई बार 0 डिग्री सेल्सियस या इससे भी कम हो जाता है। ऐसी अवस्था में ओस की बूंदें जम जाती हैं। इस अवस्था को हम पाला कहते हैं। पाला दो प्रकार का होता है
काला पाला- यह उस अवस्था को कहते हैं जब जमीन के पास हवा का तापमान बिना पानी के जमे शून्य डिग्री सेल्सियस से कम हो जाता है। वायुमंडल में नमी इतनी कम हो जाती है कि ओस का बनना रुक जाता है, जो पानी को जमने से रोकता है।
सफेद पाला – इसमें वायुमंडल में तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से कम हो जाता है। इसके साथ ही वायुमंडल में नमी ज्यादा होने की वजह से ओस बर्फ के रूप में बदल जाती है। पाले की यह अवस्था सबसे ज्यादा हानि पहुंचाती है। यदि पाला अधिक देर तक रहे, तो पौधे मर भी सकते हैं।
पाले के लक्षण व उससे होने वाला पौधे व फसल पर प्रभाव-
1. पाला के प्रभाव से फल कमजोर तथा कभी कभी मर भी जाता है। फूलो में सुकड़न आने वो झड़ने लगते है।
2. पाले से फसल का रंग समाप्त होने लगता जिससे पौधे कमजोर तथा पीले पड़ने लगाते है, तथा पत्तियों का रंग मिट्टी के रंग जैसा दिखने लगता है। फसल घनी होने से पौधों के पत्तो तक धुप हवा नहीं पहुंच पाती है। जिससे पत्ते सड़ने लगते है और बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते है। जिससे पौधों में कई बीमारियों का प्रकोप बढ़ने लग जाता है।
3. इसमें अगर फलो की बात की जाये तो फल के ऊपर धब्बे पड़ जाते हैं व स्वाद भी खराब हो जाता है।
4. पाले से फल व सब्जियों में कीटों का प्रकोप भी बढ़ने लग जाता है, जिससे सब्जियां सुकुड़ तथा ख़राब हो जाती है। जिससे कभी-कभी शत प्रतिशत सब्जियों की फसल नष्ट हो जाती है।
5. पाले के कारण अधिकतर पौधों के पत्ते ,टहनियां और तने के नष्ट होने से पौधों को अधिक बीमारियां लग जाती है और फूलो के गिरने से पैदावार में कमी आ जाती है।
पाले (कोहरा) तथा शीतलहर से फसल की सुरक्षा के उपाय
1. जब रात को कोहरा दिखने लगे या ठंडी हवा चलने की संभावना हो उस समय खेत के आस पास हवा दिशा में खेतों मेड़ों पर रात्रि में कूड़ा-कचरा जलाकर हल्क धुआं करना चाहिए, ताकि खेत में धुआं हो जाए एवं वातावरण में गर्मी आ जाए। धुआं करने के लिए क्रूड ऑयल का प्रयोग भी कर सकते हैं। जिससे हमारे खेत के ऊपर एक परत सी बन जाती है। ऐसा करने से 4 डिग्री सेल्सियस तापमान आसानी से बढ़ाया जा सकता है।
2. आलू को पाला झुलसा रोग से बचाए रखने के लिए हर संभव सिंचाई पर ध्यान देना चाहिए. पौधों को पाला से बचाने के लिए किसान खेतों में नमी बनाए रखें. इससे काफी हद तक फसल को पाले से राहत मिलती है. तो वहीं आलू की फसल में पाला और झुलसा रोग के प्रकोप से बचाया जा सकता है. इसके अलावा पाले से पौधों को बचाने के लिए परंपरागत एवं रासायनिक तरीकों का भी प्रयोग किया जा सकता है. साथ ही आलू की फसल को पाले से बचाने के लिए करीब 20 से 25 दिन तक का सड़ा हुआ मठ्ठा 4 लीटर, 100 लीटर छाछ के पानी में घोल लें और फसल में दो से तीन बार छिड़क दें. इससे फसल को पाले से बचा सकते है.
3. घना कोहरा गेहूं के फसलों के लिए लाभदायक साबित होगा।गेहूं और जौं की फसल को कोहरा उस समय फायदा पहुंचता है जब धूप निकलती रहती है। बीते दिनों में धूप कम निकली है और कोहरा अधिक पड़ा है। ऐसे में गेहूं व जौं की फसल की बढ़वार रुकने की संभावना बढ़ रही है। किसान अपने खेतों में हल्की सिंचाई करें। यदि संभव हो तो बौछारी सिंचाई कर दें जो सबसे अधिक फायदा पहुंचाती है।
4. पाला गिरने की संभावना या कोहरा ज्यादा पड़ने लगे तब खेत में हल्की सिंचाई करनी चाहिए। नमी युक्त जमीन में काफी देर तक गर्मी रहती है, तथा मिट्टी का तापमान कम नहीं होता है। इस प्रकार पर्याप्त नमी होने पर शीतलहर व पाले से नुकसान की संभावना कम हो जाती है। यदि हो सके तो सिचाई फुब्बारे से करनी चाहिए।
5. पाले से सबसे अधिक नुकसान नर्सरी में होता है। नर्सरी में पौधों को रात में प्लास्टिक की चादर से ढकने की सलाह दी जाती है। ऐसा करने से प्लास्टिक के अंदर का तापमान 2-3 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है। इससे सतह का तापमान जमाव बिंदु तक नहीं पहुंच पाता और पौधे पाले से बच जाते हैं, लेकिन यह महंगी तकनीक है। गांव में पुआल का इस्तेमाल पौधों को ढकने के लिए किया जा सकता है। पौधों को ढकते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि पौधों का दक्षिण-पूर्वी भाग खुला रहे, ताकि पौधों को सुबह व दोपहर को धूप मिलती रहे।
6. जब पाला पड़ने की संभावना हो उन दिनों फसलों पर गंधक के 0.1% घोल का छिड़काव करना चाहिए। इस हेतु 1 लीटर गंधक को 1000 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टर में छिड़काव करे जिसका का असर 10 से 15 दिनों (लगभग दो हफ्तों तक) तक रहता है। यदि दो हफ्तों के बाद भी शीतलहर तथा पाले की संभावना बनी रहे तो गंधक का छिड़काव को 10-15 दिन के अंतराल पर दोहराते रहे।
7. इस समय माइक्रो न्यूट्रीशियन और फांजीसाइड का भी छिड़काव कर सकते है। इससे भी फसल को काफी राहत मिलेगी।
8. खेत की सिचाई के लिए बनी चारो तरफ की नालिया को पानी से भर देने से भी काफी राहत मिलती है

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